परिसीमन से कितनी बदल जाएगी जम्मू-कश्मीर की तस्वीर, सियासी दलों में क्या डर?



श्रीनगर
परिसीमन होने से जम्मू-कश्मीर में सियासी तस्वीर कितनी बदल सकती है? इस प्रक्रिया का असर राज्य पर किस तरह पड़ेगा? क्या इससे किसी एक क्षेत्र को अधिक लाभ मिलेगा? क्यों कुछ राजनीतिक दल परिसीमन प्रक्रिया के पूरा होने से पहले ही इसका विरोध कर रहे हैं? परिसीमन से राज्य में कितनी विधानसभा सीटें बढ़ सकती हैं?

ये सवाल तब उठे हैं जब ऐसी सहमति बनती दिख रही है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटने के बाद राजनीतिक प्रक्रिया परिसीमन प्रक्रिया के पूरी होने के तुरंत बाद शुरू हो सकती है। बुधवार को पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं की मीटिंग में भी सरकार की ओर से कहा गया कि परिसीमन प्रक्रिया जल्द पूरी हो जाएगी।

क्यों होता है परिसीमन
परिसीमन जनसंख्या के बदलते स्वरूप को देखते हुए जनप्रतिनिधित्व को भी नए सिरे से गठित करने की एक प्रक्रिया है। हर जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया चलाई जा सकती है। जम्मू-कश्मीर में परिसीमन इसलिए देश के दूसरे हिस्सों से अलग था क्योंकि अनुच्छेद 370 के तहत ऐसा कराने का विशेषाधिकार राज्य विधानसभा के पास था। परिसीमन के आधार पर कम जनप्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों में संतुलन बनाने की कोशिश होती है। साथ ही आरक्षित सीटों के प्रतिनिधित्व को भी नए सिरे से तय करने का रास्ता खोलता है।

क्या है परिसीमन की मौजूदा स्थिति
5 अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाते हुए उससे राज्य का दर्जा वापस लिया गया तो उसके बाद यह दो केंद्रशासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बंट गया। इसके बाद केंद्र सरकार ने यहां नए सिरे से विधानसभा और संसद की सीटों को बनाने के लिए पिछले साल फरवरी में एक विशेष परिसीमन आयोग का गठन किया था। तीन सदस्यों के इस आयोग को सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज रंजन प्रकाश देसाई हेड कर रहे हैं।

कमिटी को एक साल में रिपोर्ट देनी थी लेकिन कोविड के कारण ऐसा नहीं हो सका। कमिटी को अपनी रिपोर्ट देने के लिए एक साल का विस्तार और दिया गया है। पिछले कुछ दिनों से तमाम राजनीतिक दलों और अधिकारियों के साथ परिसीमन आयोग की लगातार मीटिंग हो रही है। माना जा रहा है कि इस साल अगस्त महीने तक परिसीमन आयोग अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप सकता है। आम सहमति बनाने के लिए आयोग ने पांच राजनीतिक दलों के नेताओं को भी इसका मेंबर बनाया था, जिसमें फारूक अब्दुल्ला, मोहम्मद अकबर लोन, हसनैन मसूदी, जितेंद्र सिंह और जुगल किशोर शर्मा शामिल हैं।

इससे क्या बदलेगा?हालांकि परिसीमन आयोग ने अब तक न अपनी रिपोर्ट सौंपी है और न ही इस बारे में कोई सहमति बनने के संकेत दिए हैं। लेकिन अब तक जो संकेत सामने आए हैं उसके मुताबिक जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों में इजाफा हो सकता है। वहां अब तक 83 विधानसभा सीटें रही हैं। इनमें 37 सीटें जम्मू और 46 सीटें कश्मीर क्षेत्र में आती हैं। इसके अलावा 24 सीटें पीओके के लिए आरक्षित रखी गई है जहां अभी चुनाव नहीं होते हैं।

परिसीमन के बाद इसमें 7 सीटें बढ़ सकती हैं, यानी कुल प्रभावी सीट 90 हो सकती हैं। इसमें 4 सीटें कश्मीर और 3 सीटें जम्मू में जा सकती है। लेकिन परिसीमन आयोग अभी इन अटकलों को खारिज कर रहा है। परिसीमन आयोग से पहले तब जम्मू-कश्मीर में सीटों के आनुपातिक वितरण को लेकर विवाद होता रहा है। जम्मू क्षेत्र के इलाके हमेशा कहते रहे हैं कि उनका प्रतिनिधित्व कम है। बीजेपी इन मांगों के साथ रही है। बीजेपी ने हमेशा इस इलाके में राजनीतिक तौर पर बेहतर प्रदर्शन किया है।

वहीं कश्मीर इलाके के लोग इस तर्क को खारिज करते रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस तरह उनका क्षेत्र बड़ा है, कायदे से उनका प्रतिनिधित्व बढ़ना ही चाहिए। इन तर्कों के बीच इस बार परिसीमन आयोग की रिपोर्ट आने से पहले राज्य के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने पहले ही इसके प्रति अपनी आशंका जाहिर कर दी है। लेकिन आशंका सिर्फ कश्मीर के नेताओं की नहीं है।

जम्मू के नेताओं की आशंका परिसीमन के लिए जनगणना का कौन सा साल पैमाना बनाया जाए, इसे लेकर भी है। वे 2001 जनगणना को आधार बनाना चाहते हैं। उनका तर्क है कि 2001 से 2011 के बीच जम्मू क्षेत्र की जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार कश्मीर में जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार से कम रही है। इस बारे में बीजेपी परिसीमन आयोग के पास अपनी औपचारिक आपत्ति भी दर्ज करा चुकी है। लेकिन सूत्रों के अनुसार इस आपत्ति को दरकिनार करते हुए 2011 जनगणना को ही आधार बनाया जा रहा है।

अभी कश्मीर के पक्ष में है समीकरण
मौजूदा परिदृश्य में चुनावों में जो कश्मीर में बेहतर प्रदर्शन करता है वह लाभ में रहता है। लेकिन नए परिसीमन के बाद अगर जम्मू के पक्ष में आंकड़े हो गए तो इसका असर पूरे इलाके की सियासत पर पड़ सकता है। कश्मीर की सीटों में लद्दाख के भी इलाके आते थे जो पहले ही अलग हो चुके हैं। पिछले दिनों जिला विकास परिषद के चुनाव में इसका साफ असर दिखा। जम्मू में बीजेपी ने लगभग पूरी जीत हासिल की तो कश्मीर में गुपकर गठबंधन में बाजी मारी। बीजेपी का हमेशा मानना रहा है कि अगर जम्मू के पक्ष में आंकड़ों का गणित आ गया तो जम्मू-कश्मीर में अकेले शासन करने का रास्ता खुल सकता है।

और ठीक यही आशंका कश्मीर के दलों में भी है और वे मौजूदा लाभ किसी भी सूरत में नहीं खोना चाहते हैं। यही कारण है कि परिसीमन प्रक्रिया पर अपनी सहमति दें या नहीं, इसे लेकर कई दिनों तक राजनीतिक दलों में अनिर्णय की स्थिति रही। लेकिन बाद में कमोबेश सभी राजनीतिक दलों ने इस प्रक्रिया में साथ रहने के संकेत दिए हैं। परिसीमन आयोग अपनी रिपोर्ट देने के बाद सभी दलों से आपत्ति मांग सकता है। राजनीतिक दलों को भरोसा दिलाया गया है कि अगर उनके पास कोई तथ्य आधारित आपत्ति रही तो उसे जरूर सुना जाएगा।

कब अंतिम बार हुआ था परिसीमन?
जम्मू-कश्मीर में अंतिम बार परिसीमन 1995 में हुआ था। इससे पहले वहां आजादी के बाद 1963 और 1973 में विधानसभा सीटों का परिसीमन हुआ था। जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने एक प्रस्ताव पास कर राज्य में परिसीमन पर 2026 तक रोक लगा दी थी। लेकिन जब राज्य में विधानसभा भंग कर वहां अनुच्छेद 370 हटाया गया तो वह रोक स्वत: हट गई। चूंकि जम्मू-कश्मीर अभी केंद्र शासित प्रदेश है, अत: वहां परिसीमन प्रक्रिया केंद्र सरकार के अधीन हो रही है। परिसीमन करने का सबसे बड़ा आधार जनसंख्या होती है।



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