दुनियाभर में लो कॉस्ट हथियार की तरह उभरे हैं 'ड्रोन बम', जम्मू हमले के बाद बढ़ीं चुनौतियां



नई दिल्लीजम्मू में एयरफोर्स स्टेशन पर हुए ड्रोन () हमले से यूं तो कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन हमले के इस तरीके ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कुछ समय से भारत ही नहीं दुनियाभर में ‘ड्रोन अटैक’ आतंकी संगठनों के लिए एक लो कॉस्ट ऑप्शन बनकर उभरे हैं। भारत में पहली बार किसी महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने को ड्रोन से निशाना गया है। मगर दुनियाभर में बीते दो सालों में ड्रोन के आक्रामक इस्तेमाल को देखते हुए जरूरत है कि भारत की सुरक्षा एजेंसियां भी उसी के हिसाब से अपनी रणनीति बनाएं जिससे भारत में दोबारा किसी सैन्य ठिकाने पर ऐसा कोई ड्रोन हमला न हो सके।

यमन में बैठे-बैठे उग्रवादियों ने उड़ा दिया सऊदी का ऑयल प्लांट14 सितंबर 2019 को सऊदी अरब स्थित दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको (Abqaiq–Khurais attack) के दो प्लांटों पर ड्रोन के जरिए हमला किया गया था। इसके बाद वहां भयंकर आग लग गई। दुनिया की सबसे बड़ी ऑइल फैसिलिटी पर हुए हमले का असर पूरी दुनिया की ऑयल सप्लाई पर पड़ा और कच्चा तेल उत्पादन महज आधा रह गया। हमले की जिम्मेदारी यमन के हूती उग्रवादियों ने ली थी। ये यमन सिविल वॉर में सऊदी अरब के लगातार दखल से नाराज थे। संगठन ने बताया कि उसने यमन में बैठे-बैठे दस ड्रोन के जरिए सऊदी अरब पर हमला किया था। हालांकि सऊदी प्रशासन का दावा था कि उस पर ईरान की तरफ से भी ड्रोन के जरिए हमला किया गया था।

44 दिन चले युद्ध में जमकर हुआ ड्रोन का इस्तेमालइसके अलावा अजरबैजान और आर्मीनिया () के बीच युद्ध के दौरान भी ड्रोन का जमकर उपयोग किया गया। सितंबर 2020 में शुरू हुई जंग करीब 44 दिन चली और नवंबर में रूस की मध्यस्थता के साथ खत्म हुई। इन 44 दिनों के दौरान दोनों ही देशों ने ड्रोन, यूएवी और मिसाइलों के जरिए एक-दूसरे पर हमला किया। यह हाल के सालों में पहली दफा था जब दो देशों के बीच उग्र युद्ध के दौरान ड्रोन अटैक जैसी टेक्नॉलजी का भी खूब इस्तेमाल किया गया।

सऊदी और अजरबैजान से भारत को सीख लेने की जरूरतसऊदी और अजरबैजान-आर्मीनिया में ड्रोन हमलों के उदाहरण से भारत को सीख लेनी होगी और भविष्य में ड्रोन हमलों से निपटने के लिए प्रभावी इंतजाम करने होंगे। क्योंकि पिछले कुछ सालों ने पाकिस्तानी की तरफ से भी ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ा है। आतंकी हथियार सप्लाई करने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल पिछले कुछ समय से करते ही आ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बीएसएफ और सुरक्षाबलों ने ऐसे कई ड्रोन्स को ढेर किया है।

हमले के लिए ड्रोन का इस्तेमाल क्यों बड़ा सिरदर्द?ड्रोन के जरिए हमले की रणनीति इसलिए भी बड़ा सिरदर्द है क्योंकि इन पर लागत बेहद कम आती है। आतंकियों की ट्रेनिंग पर बहुत ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता। फील्ड हमलों के मुकाबले ऑपरेटिंग कॉस्ट बेहद कम है और फील्ड हमलों की तरह रिस्क भी नहीं है। ड्रोन इसलिए भी बड़ी चुनौती हैं क्योंकि ये बेहद कम ऊंचाई पर उड़ सकते हैं और ऐसे रेडार की पकड़ में भी नहीं आएंगे। ऐसे में इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि आगे भी आतंकी संगठन इनका इस्तेमाल करेंगे। इसलिए भारत को अपने सैन्य ठिकानों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा व्यवस्था को और अडवांस करना पड़ेगा।

भारत के पास क्या विकल्प?भारत को सीमा के पास मौजूद सैन्य ठिकानों की सुरक्षा-व्यवस्था का नए सिरे से खाका खींचना होगा। इसमें अडवांस रेडार सिस्टम, ऐंटी ड्रोन मिलिट्री टेक्नॉलजी, रेडियो जैमर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करना होगा। साथ ही मिलिट्री इंटेलिजेंस को और मजबूत बनाना होगा।

जम्मू स्टेशन पर हमले के बाद पठानकोट एयरबेस पर हाई अलर्टजम्मू में वायुसेना स्टेशन पर दो विस्फोट होने के बाद सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। पंजाब के सीमावर्ती इलाकों, मुख्य रूप से पठानकोट एयरबेस में हाई अलर्ट है। अधिकारियों ने बताया कि पठानकोट और गुरदासपुर के सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। पठानकोट में 2 जनवरी 2016 को आतंकवादी हमला हुआ था। साथ ही, भारतीय सेना के ममून छावनी के पास भी सुरक्षा बढ़ाई है।



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